सावन के अंतिम सोमवार को महादेव के दरबार में उमड़े भक्त, गोदौलिया तक लगी कतार

Devotees gathered at Mahadev's court on the last Monday of Sawan, queued up to Godoulia (11)

वाराणसी। कोरोना महामारी के दौरान सावन के पवित्र माह में इस वर्ष काशी में भक्तों का रेला देखने को नहीं मिला पर सावन के आखरी सोमवार को पड़े रक्षाबंधन पर्व पर भक्तों की कतार महादेव के दर्शन के लिए देखी गयी। मंगला आरती के बाद बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने के लिए भक्त उमड़े। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए भक्तों ने महादेव का सावन के अंतिम दिन झांकी दर्शन के साथ ही साथ जलाभिषेक भी किया।

इस वर्ष पड़े सावन के चार सोमवारों में अंतिम सोमवार को महादेव का दर्शन करने के लिए श्रद्धालु आतुर दिखे। कोरोना काल में सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क और सेनीटाइजर के साथ ही साथ थर्मल स्कैनिंग की प्रक्रिया से गुज़र कर भक्तों ने महादेव के दर्शन किए।

छत्ताद्वार के बाद अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही महिला प्रतिमा उपाध्याय ने बताया कि आज सावन का चौथा सोमवार है और ऐसा संयोग कई वर्ष बाद पड़ता है जब सावन का चौथा सोमवार, रक्षाबंधन पर्व एक ही दिन पड़े। ऐसे में महादेव का दर्शन का आज हम सभी देश से कोरोना के खात्मे कि प्रार्थना करेंगे।

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विप्र सम्प्रदाय ने किया वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच गंगा में श्रावणी उपाकर्म

Vipr Sampraday performed Shravani Upakram in Ganga amid Vedic chanting

वाराणसी। प्रतिवर्ष सावन माह की पूर्णिमा तिथि को विप्र समाज गंगा की गोद में अपना श्रावणी उपाकर्म करता है। इसी क्रम में आज विप्र समाज ने अहिल्याबाई गंगा घाट पर प्रायश्चित संकल्प, स्वाध्याय व संस्कार का उपाकर्म किया। यह श्रावणी उपाकर्म को हिमाद्री संकल्प के साथ किया गया। वैदिक कालीन परम्परा को अक्षुण रखते हुए काशी का विप्र समाज प्रतिवर्ष श्रावण माह के पूर्णिमा तिथि को गंगा तट रक्षाबंधन के दिन यह कार्य सदियों से चला आ रहा है।

रक्षाबन्धन के पर्व पर जहां बहने भाइयों को सुबह से ही राखी बांधकर उनकी दीर्घायु की प्रार्थना कर रहीं है तो भाई उनकी रक्षा का संकल्प ले रहे हैं। वहीं सदियों की परम्परा को अहिल्याबाई घाट पर विप्र समाज ने संपन्न किया। शुक्लयजुर्वेदीय माध्यान्दिनी शाखा के ब्राह्मणों द्वारा शास्त्रार्थ महाविद्यालय के वैदिक आचार्य पंडित विकास दीक्षित के आचार्यत्व में वैदिक मंत्रों के उच्चारण के बीच विप्र समाज का श्रावणी उपाकर्म गंगा तट पर मनाया गया।

इस सम्बन्ध में आचार्य पंडित विकास दीक्षित ने बताया कि इस पर्व के दिन गोमय, गौमूत्र, गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत मिश्रित पंचगव्य से स्नान कर भस्म लेपन किया जाता है। उसके बाद कुशा, दुर्वा व अपामार्ग से मार्जन कर ब्राह्मणों ने अंत:करण और बाह्यकरण की शुद्धि के साथ सूर्य का ध्यान कर तेज की कामना की जाती है। इसके बाद विप्र समाज के सभी लोगों ने नूतन यज्ञोपवीत का ऋषि पूजन कर उसे धारण किया।

विप्र समाज के संयोजक आचार्य विकास दीक्षित ने बताया कि श्रावणी द्वारा वर्ष पर्यन्त ज्ञात-अज्ञात पापकर्मों के प्रायश्चित के साथ जगत कल्याण की कामना भी की जाती है। प्रायश्चित संकल्प, स्वाध्याय व संस्कार के लिए यह श्रावणी उपाकर्म मनाया जाता है। प्रतिवर्ष सैकड़ों की संख्या में ब्राह्मण व बटुक इसको करते आ रहे थे, किन्तु इस वर्ष कोरोना संक्रमण को देखते हुए संख्या न्यूनतम की गई है। .

इस बार रक्षाबंधन पर सर्वार्थ सिद्धि सहित पांच सुखद संयोग

इस बार रक्षाबंधन पर सर्वार्थ सिद्धि सहित पांच सुखद संयोग बन रहे हैं। इसमें सुबह 9.28 बजे तक भद्रा : दिन में दो बार खास मुर्हूत। अपरान्ह 1.35 बजे से शाम 4. 35 बजे, शाम 7.30 बजे से रात 9.30 बजे के बीच बहनें बाध सकेगी रक्षासूत्र।

पूर्णिमा तिथि आज देर शाम 8. 43 बजे से लग जायेगी। सनातन परम्परा में उदयाकाल में ही त्यौहार मनाया जाता है। ऐसे में सुबह 9.28 बजे तक भद्रा काल के बाद बहनें भाइयों के कलाई पर रक्षासूत्र बांध सकती हैं।

रक्षा बंधन के दिन अपराह्न में ही बहनों को राखी बांधनी चाहिए। अगर अपराह्न समय न हो तो प्रदोष काल में राखी बांधनी चाहिए। पौराणिक कथा के अनुसार, रावण की बहन ने भद्रा काल में उसे राखी बांधी थी, जिस से रावण का विनाश हो गया था।

ति‍रुपति‍ में जि‍नके दर्शन को उमड़ते हैं लाखों लोग, काशी में वीरान है भगवान वेंकटेश्‍वर का मंदि‍र

वाराणसी। धर्म और आध्‍यात्‍म की राजधानी काशी वि‍भि‍न्‍न प्रकार के देवालयों से भरी पड़ी हैं। बाबा श्री काशी वि‍श्‍वनाथ की नगरी में वि‍श्‍वेश्‍वर ज्‍योर्लिंग मंदि‍र स्‍थापि‍त है, जि‍सके दर्शन के लि‍ये दुनि‍याभर से सनानतधर्मी वाराणसी आते हैं। हालांकि‍ हर यानी महादेव की नगरी काशी में हरि‍ (वि‍ष्‍णु) के मंदि‍र भी कम नहीं है। मगर आपको जान कर हैरानी होगी कि‍ भगवान वि‍ष्‍णु के रूप कहे जाने वाले भगवान वेंकटेश्‍वर का भी एक मंदि‍र काशी नगरी में मौजूद है।

जी हां, आपने ठीक पढ़ा। भगवान वेंकटेश्‍वर जि‍नके दर्शन के लि‍ये आंध्र प्रदेश के पवि‍त्र शहर ति‍रुपति‍ में हर रोज लाखों दर्शनार्थी अपनी अपनी मनोकामनाओं के साथ पहुंचते हैं। भारत का सबसे अमीर और भव्‍य मंदि‍र कहे जाने वाले ति‍रुपति‍ मंदि‍र में वि‍राजमान भगवान वेंकटेश्‍वर का एक मंदि‍र काशी में भी है।

काशी के कोनिया इलाके में 150 वर्ष पूर्व स्थापित तोताद्री मठ मे स्थापित भगवान् ति‍रुपति‍ बालाजी का मंदि‍र, जहां वि‍राजमान हैं भगवान वेंकेटेश। सबसे अहम बात ये है कि‍ जहां एक ओर आंध्र प्रदेश के ति‍रुपति‍ शहर में ति‍रुमला पर्वत पर भगवान वेंकटेश्‍वर का भव्‍य मंदि‍र है और वहां प्रति‍दि‍न लाखों की संख्‍या में श्रद्धालु अपनी आस्‍था और वि‍श्‍वास के साथ आते हैं, वहीं दूसरी तरफ वाराणसी में मौजूद ति‍रुपति‍ बालाजी का मंदि‍र तकरीबन खंडहर हो चुका है और ज्‍यादातर वक्‍त ये सूनसान ही रहता है।

 

150 साल से वरुणा और गंगा के संगम पर वि‍राजमान हैं भगवान् वेंकटेश्‍वर
कहते हैं काशी के कण कण में शंकर बसे हैं पर गंगा और वरुणा के संगम से कुछ दूर पहले कोनिया पलंग शहीद के पास स्थित है भगवान् वेंकटेश्‍वर का विशाल किंतु खंडहरनुमा मंदिर। इस मंदिर को 150 साल पहले रामानुज स्वामी ने स्थापित किया था। वैष्णव सम्प्रदाय के इस मंदिर के बाहर झाड़ झंखड़ा है पर अंदर आते ही किसी औलौकिक शक्ति का एहसास होता है। शान्ति मानों यहाँ जैसे घर कर गयी है और यहाँ कभी किसी ने तेज़ आवाज़ में बात भी नहीं की है।

वैष्णव सम्प्रदाय का है मंदिर
मंदिर के बारे में बात करते हुए दिलीप कुमार पांडेय ने बताया कि यह वैष्णव सम्प्रदाय का मंदिर है जिसका निर्माण रामानुज स्वामी ने आज से 150 साल पहले किया था। इस मंदिर में तिरुपति बालाजी को वेंकटश्वर स्वामी के रूप में पूजा जाता है। तोताद्री मठ के बारे में बात करते हुए दिलीप ने बताया कि यह रामनुज सम्प्रदाय की गद्दी का नाम है जो तमिलनाडू में नागुणेरी नामक स्थान पर है। उस जगह के नाम पर पूरे देश में रामनुज सम्प्रदाय के तोताद्री मठ विराजमान हैं।

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दशश्वमेध घाट पर है महाविद्यालय
दिलीप ने बताया कि इस मठ में वर्षों से छात्रों का आवागमन और शिक्षा दीक्षा का कार्य होता आया है। इसका एक महाविद्यालय जिसमे छात्र आचार्य तक की पढ़ाई कर सकता है दशाश्वमेध घाट पर रामनुज दर्शन महाविद्यालय के नाम से स्थापित है। छात्र वहां रहते और पढ़ते हैं। यहां भी उनका आना जाना लगा रहता है।

सावन के महीने में अनुपम होती है छटा
दिलीप ने बताया कि सावन के महीने में यहां भगवान् वेंकेटेश्वर से आशीर्वाद लेने के लिए भक्त आते हैं। इस वर्ष कोरोना काल की वजह से सावन में लगने वाला झूला भी स्थगित कर दिया गया है। इस मंदिर में भगवान् बालाजी के साथ श्री कृष्ण, श्रीदेवी और भू देवी स्थापित हैं। भगवान् बालाजी की प्रति‍मा अचल जबकि‍ श्रीकृष्ण, श्रीदेवी और भू देवी की प्रतिमा चल हैं, जो सावन में प्रांगण में ही झूला झूलती हैं और भक्त आशीर्वाद लेने आते हैं।

मंदिर के पुजारी की उम्र है महज़ 15 साल
तिरुपति बालाजी के इस मंदिर में पुजारी भी अपने आप में अद्भुत हैं। पूर्व मध्यमा में पढ़ने वाले भागलपुर, बिहार के रहने वाले अभय कुमार दुबे इस मंदिर में एक साल से पुजारी हैं। इसी सम्प्रदाय के महाविद्यालय जो कि दशाश्वमेध में स्थित के छात्र हैं। 3 साल से बनारस में रह रहे अभय इस कार्य से बहुत खुश हैं।

मन को मिलती है शान्ति
अभय ने बताया कि भगवान् बालाजी की आरती और उन्हें भोग चढाने पर मन को असीम शान्ति मिलती है। भगवान् बालाजी के इस मंदिर का पुजारी बनने के लिए जब मेरे गुरु ने मुझसे पूछा था तो मुझे बहुत ही अच्छा लगा। यहाँ आने के बाद ऐसा लगा कि जैसे यहाँ पहले भी आया हूं।

शुक्रवार को है दर्शन का दिन
पुजारी अभय ने बताया कि भगवान् बालाजी के वेंकटेश्वर स्वरूप का दर्शन शुक्रवार को करना लाभकारी है। यहां शुक्रवार को भक्त आते हैं और भगवान् का दर्शन प्राप्त कर निहाल होते हैं।

 

रामनुज स्वामी, राम दरबार और बजरंगबली के भी हैं मंदिर
इसी प्रांगण में तिरुपति बालाजी के एक तरफ रामनुज स्वामी और एक तरफ राम दरबार में भगवान् राम, लक्ष्मण और माता सीता स्थापित हैं तो वहीं बजरंगबली का भी मंदिर इस प्रांगण में है।

शहर की सीमा पर बने राजघाट पुल से कुछ दूर पहले स्थापित तोताद्री मठ में यह मंदिर अपने आप में अद्भुत है। अगर आपने आज तक इस मंदि‍र में दर्शन नहीं कि‍या है तो एक बार यहां जरूर जाएं। वहीं वाराणसी जि‍ला प्रशासन और पर्यटन वि‍भाग को भी खंडहर में तब्‍दील हो रहे इस मंदि‍र की सुध लेते हुए इसे धार्मि‍क पर्यटन के रूप में वि‍कसि‍त करना चाहि‍ए। काशी में भगवान वेंकटेश्‍वर का प्राचीन मंदि‍र नि‍:संदेह यहां आने वाले लाखों दक्षि‍ण भारतीय पर्यटकों के आकर्षण का भी केंद्र हो सकता है।

श्रीराम मंदिर भूमि पूजन के लिए धर्म की नगरी काशी से रवाना हुआ विश्वनाथ का अभिषेक किया हुआ जल

Vishwanaths anointed water departed from Kashi the city of religion to worship Shree Ram temple

वाराणसी। 5 अगस्त को अयोध्या में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राम मंदिर की शिला पूजन में पहुँच रहे हैं। इस पवित्र कार्य के लिए पूरे देश से पवित्र नदियों का जल और मिट्टी अयोध्या भेजी जा रही है। इसी क्रम में गुरुवार को गंगा महासभा के स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती की अगुवाई में विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ताओं ने वरुणा और अस्सी परीक्षेत्र से बाहर सामनेघाट से गंगाजल और मिट्टी एकत्रित की और उस गंगाजल से बाबा विश्वनाथ का अभिषेक कर उसे इकठ्ठा किया और अयोध्या के लिए रवाना हुए।

बाबा विश्वनाथ का दरबार हमेशा महादेव के जयघोष से गुंजायमान रहता है, पर गुरुवार को बाबा विश्वनाथ का दरबार जय श्रीराम के नारों से गुंजायमान था। मौका था विश्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं द्वारा अयोध्या ले जाए जा रहे गंगा जल और काशी की मिट्टी के बाबा विश्वनाथ को चढाने का। कार्यकर्ता दोपहर बाद गंगा महासभा के आचार्य जितेंद्रानंद सरस्वती के सानिध्य में छत्ताद्वार पहुंचे थे।

इस सम्बन्ध में बात करते हुए स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने बताया कि बाबा विश्वनाथ के बगैर भगवान् राम की पूजा पूरी नहीं होती और भगवान् राम के बगैर बाबा विश्वनाथ की पूजा पूरी नहीं होती, इसलिए आगामी पांच अगस्त को 492 वर्ष की गुलामी की ज़ंजीरों को तोड़ते हुए देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी श्री राम जन्म भूमि का भूमि पूजन कर रहे होंगे तो उस समय बाबा विश्वनाथ को चढ़ा हुआ गंगाजल और यह मिट्टी जो बुद्ध के ज्ञान की है, कबीर के जन्म की है, रैदास की भूमि की है।

उन्होंने बताया कि हिमालय से शिव की जटाओं से निकलने के बाद काशी में गंगा भगवान् शिव से मिलती हैं। इसलिए आज बाबा विश्वनाथ के प्रांगण में श्रवण शुक्ल पक्ष की एकदाशी पर पूजन करके विश्व हिन्दू परिषद् के कार्यकर्ताओं के साथ इस मिट्टी और गंगा जल को लेकर यहाँ से रवाना हो रहे हैं। उन्होंने यह साफ़ किया कि शास्त्रार्थ के अनुसार यह मिट्टी अस्सी और वरुणा क्षेत्र की नहीं है क्योंकि अस्सी और वरुणा के बीच की मिट्टी और गंगाजल कहीं ले जाया नहीं जा सकता।

इस सम्बन्ध में जब विश्व हिन्दू परिषद् के महानगर मंत्री राजन तिवारी ने बताया कि हमें आज अयोध्या रवाना होना था लेकिन कुछ कारण से यह आज टल गया है। कार्यकर्ता शुक्रवार को और स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती एक या तीन अगस्त को अयोध्या तक रवाना होंगे।

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श्रीराम मंदि‍र के लि‍ये न काशी की मि‍ट्टी जाएगी न जाएगा यहां का गंगाजल, फि‍र आशीर्वाद स्‍वरूप जाएगा क्‍या ?

वाराणसी। 5 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी श्री राम जन्म भूमि पर भव्य मंदिर भूमि पूजन करेंगे। इसकी तैयारी में पूरा देश लगा हुआ है। इस आयोजन में काशी से गंगा जल और मिटटी ले जाने की बात चल रही थी पर संतों के अनुसार यह कार्य अशास्त्रीय है इसलिए यह कार्य नहीं होगा। ऐसे में सवाल उठता है कि‍ आखि‍र वि‍श्‍वनाथ की नगरी काशी से आखि‍र श्रीराम मंदि‍र के लि‍ये आशीर्वाद स्‍वरूप क्‍या जाएगा?

इस बारे में अखि‍ल भारतीय संत समि‍ति‍ के सचि‍व स्‍वामी जि‍तेन्‍द्रनंद सरस्‍वती ने जानकारी दी है। उन्‍होंने बताया कि‍ भगवान् शिव की नगरी काशी से न तो गंगाजल कहीं ले जाया जा सकता है और ना ही यहां की मि‍ट्टी ही। ये अशास्‍त्रीय है और ऐसा धर्म कार्य के लि‍ये नहीं कि‍या जाता है। तो अब वाराणसी से गोमुख का गंगाजल, चन्दन और चांदी का बेल पत्र जाएगा।

स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने बताया कि गंगा महासभा का कार्यालय चूंकि‍ काशी में है, इसलिए यहाँ से तीन चीजें अयोध्‍या जाएंगी, जिसमे गोमुख का गंगाजल होगा। इसके अलावा ‘बिन छल विश्वनाथ पद नेहू, राम भगत के लक्षण एहू’ श्लोक के माध्यम से उन्होंने बताया कि बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद वहां आये हुए, भूमी पूजन में बैठे हुए संतों के माथे पर लगे इसलिए यहां से चन्दन जाएगा।

स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती के अनुसार भूमी पूजन के समय मंदिर की नींव में डालने के लिए चांदी का बेलपत्र गंगा महसभा की तरफ से भेजा जाएगा। यही काशी विश्वनाथ का आशीर्वाद है अपने इष्ट भगवान राम के चरणों में।

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सावन के चौथे सोमवार को हुआ महादेव का रुद्राक्ष श्रृंगार, ऑनलाइन किया भक्तों ने दर्शन

Mahadevs Rudraksh makeup done on the fourth Monday of Sawan devotees visited online

वाराणसी। महादेव के भक्त साल भर उनके दर्शन कर निहाल होते हैं पर सावन के चौथे के सोमवार को महादेव और माता पार्वती की चल प्रतिमाओं का रुद्राक्ष श्रृंगार अद्भुत होता है। सावन को चौथे सोमवार को हुए इस श्रृंगार का भक्तों ने ऑनलाइन दर्शन किया और निहाल हुए। महादेव और माता पार्वती रुद्राक्ष से सजकर आलौकिक छठा बिखेर रहे थे।

इस दौरान मंदिर के महंत, अर्चक और कर्मचारियों के अलावा सिर्फ दैनिक दर्शन करने वाले भक्तों को ही साक्षात् दर्शन के सुख मिले बाकी भक्तों ने महामारी काल में बाबा के इस रूप के दर्शन ऑनलाइन माध्यम से किया।

सावन के चारों सोमवार को होने वाले विशेष श्रृंगार में बाबा का चौथे सोमवार को रुद्राक्ष श्रृंगार हुआ। संध्या भोग आरती से पूर्व काशी विश्वनाथ व माता पार्वती के चल प्रतिमाओं का रुद्राक्ष के दाने से भव्य श्रृंगार किया गया। पूरे गर्भगृह को भी रुद्राक्ष से सजाया गया। इस रुद्राक्ष को प्रसाद स्वरूप भक्तों में वितरित किया जाएगा। हालांकि कोरोना संक्रमण के चलते हुए लॉकडाउन के कारण संध्या में भक्तों की भीड़ कम हो गई।

महादेव के श्रृंगार के दौरान भक्तों की भीड़ तो नहीं उमड़ी पर महादेव के आशीर्वाद के लिए भक्तों ने ऑनलाइन माध्यम से दर्शन किया और भाव विभोर हुए।\

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सोमवार 27 जुलाई 2020 का पञ्चाङ्ग

|| ॐ श्रीगणेशाय नम: ||

|| श्रीसूर्यसिद्धान्तीय 🌞 काशीस्थ पञ्चाङ्ग ||

विक्रम सम्वत : २०७७
शक सम्वत : १९४२

ऋतु : वर्षा

मास व पक्ष : श्रावण , शुक्ल पक्ष

वार : सोमवार

तिथि : सप्तमी ( ०९:११ बजे तक )

नक्षत्र : चित्रा ( १३:४६ बजे तक )
(चन्द्रमा तुला राशि में अहोरात्र )

करण १ : वणिज ( ०९:११ बजे तक )
करण २ : विष्टि भद्रा ( १९:५७ बजे तक )
करण ३ : बव ( सूर्योदयपर्यन्त )

योग : साध्य (००:०४ बजे तक)

सूर्योदय : ०५:२४ बजे
सूर्यास्त : १८:४४ बजे

दिशाशूल : पूर्व

ख्रिष्टीय वर्षानुसार दिनांक २७ जुलाई २०२० ई०

|| तन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु ||
****
( कृपया समय २४ घण्टे के प्रारूप में पढ़ें )

कारगिल विजय दिवस : गंगा सेवा निधि ने 501 दीप मालाओं से शहीद जवानों को दी श्रद्धांजली

वाराणसी। कारगिल विजय दिवस की 21वीं वर्षगांठ पर गंगा सेवा निधि द्वारा दशास्वमेध घाट पर विशेष आरती के साथ 501 दिये जलाकर शहीदों को याद किया गया। हालांकि कोरोना संक्रमण की वजह से इस विशेष आरती में लोगों की सहभगिता नहीं हो सकी। पिछले साढ़े तीन महीनों से दशास्वमेध घाट पर होने वाली गंगा आरती प्रतीकात्मक रूप से ही सम्पन्न हो रही है।

गंगा घाट पर यह मोहक नजारा देख वहां मौजूद लोग भी काफी प्रसन्न दिखें। दीप मालाओं से शहीद जवानों को श्रद्धांजली और एक मुख्य अर्चक के साथ गंगा आरती की डमरु की आवाज के साथ हर हर महादेव के जयगोष से वीर शहीद जवानों के बलिदान को याद किया गया।

प्रधान अर्चक आचार्य रणधीर पाण्डेय ने बताया कि कारगिल विजय दिवस के खुशी के मौके पर आज दीपमालाओं से 21वां विजय दिवस और जयहिंद लिखकर उस भावना को पुनः स्मृति में लाने का प्रयास किया गया जो 21 साल पहले के जन-जन में था।

उन्होंने कहा आज का दिन पूरे भारत वर्ष के लिए गौरव का दिन है। इसी उपलक्ष में गंगा सेवा निधि ने एक छोटा सा प्रयास करते हुए गंगा तट पर दीप जलाकर श्रद्धांजली अर्पित की है।

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शनिवार के दिन इस पूजा विधि से शनि देव को करे प्रसन्न, जाने व्रथ कथा

वाराणसी। शनिवार का दिन शनि देव का माना जाता है। इस दिन शनिदेव की खास तरह से पूजा करने पर व्यक्ति के सभी कष्ट दूर हो जाते है। वहीं जिन लोगों पर शनि की वक्र दृष्टि पडी रहती है वह भी खत्म हो जाती है। माना जाता है कि शनि दोष से मुक्ति के लिए मूल नक्षत्र युक्त शनिवार से आरंभ करके सात शनिवार तक शनिदेव की पूजा करने के साथ साथ व्रत रखना चाहिए।

मान्यता है कि जो भी जातक शनि से जुड़े दान और उनके मंत्रों का जाप करता है, उसे बढ़ते कर्ज से मुक्ति पाने में मदद मिलती है, शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है साथ ही बीमारियों से भी छुटकारा मिलता है यहीं नहीं शनिदेव की पूजा से साढ़ेसाती के प्रकोप से भी निजात मिलती है।

शनि उपासकों के अनुसार सूर्यपुत्र शनिदेव न्याय के देवता हैं। जिस भी जातक की कुंडली में पितृदोष या कालसर्प दोष होता है तो उस जातक के जीवन में सदैव परेशानियां बनी रहती है, उनके जीवन में कभी कुछ ठीक नहीं चलता ऐसे लोगों के परिवार में अक्सर वाद-विवाद बना रहता है। जिस भी जातक पर शनि की वक्र दृष्टि पड़ जाती है, उसे लंबी बीमारी की समस्या का सामना करना पड़ता है। ऐसे जातकों के हर कार्य में विलम्ब और रुकावट आती है, नौकरी के जुड़े रास्ते में कठिनाई आती है साथ ही ऐसे जातकों को जीवन में अकेलेपन का सामना करना पड़ता है। शनिदेव की पूजा अगर विधि-विधान से की जाए तो तुरंत फलदायी होता है।

पितृदोष या कालसर्प दोष को ऐसे करे खत्म
शनिदेव के प्रकोप से बचने के लिए लोहे का छल्ला सबसे मददगार साबित होता है। चलिए अब आपको बताते हैं आखिर क्यों शनि के प्रकोप से बचने के लिए लोहे का छल्ला मददगार होता है। शनिदेव का अधिपत्य लौह धातु पर है इसलिए लोहे का छल्ला शनि देव की शक्तियों को नियंत्रित करने के काम आता है, मान्यता है कि लोहे से बना छल्ला शनि की पीड़ा को काफी हद तक कम कर देता है। लोहे का छल्ला बनवाते समय एक बात का ध्यान दें लोहे के छल्ले को आग में ना तपाये।

छल्ला धारण करने से पहले रखे इन बातों का ध्यान
लोहे के छल्ले को शनिवार के अलावा किसी भी दिन लाए। छल्ले को शनिवार की सुबह सरसों के तेल में डुबोकर रख दें शाम को इसे निकाल कर जल से धोकर शुद्ध कर लें। उसके बाद ॐ शं शनैश्चराय नमः मंत्र का जाप करें। मंत्र जाप के बाद इसे मध्यमा उंगली में धारण कर लें। ऐसा करने से शनिदेव की पीड़ा का असर कम होने लगता है।

क्यों चढ़ाते हैं तेल
माना जाता है कि रावण अपने अहंकार में चूर था और उसने अपने बल से सभी ग्रहों को बंदी बना लिया था। जब रावण शनिदेव को कैद कर लंका ले गया था। तब क्रोधित होकर हनुमानजी ने पूरी लंका जला दी थी, जिसके चलते सभी ग्रह आजाद हो गए शनि के दर्द को शांत करने के लिए हुनमान जी ने उनके शरीर पर तेल से मालिश की थी और शनि को दर्द से मुक्त‍ किया था उसी समय शनि ने कहा था कि जो भी भक्त श्रद्धा भक्ति से मुझ पर तेल चढ़ाएगा उसे सारी समस्‍याओं से मुक्ति मिलेगी। तभी से शनिदेव पर तेल चढ़ाने की परंपरा शुरू हो गई थी।